सीमा विवाद: भारत की आर्थिक और मानसिक स्तर पर भी चीन का कब्ज़ा

by GoNews Desk 1 month ago Views 14526
Border Dispute: India's economic and mental level
लद्दाख की गलवान वैली में चीनी सेना के साथ हिंसक झड़प में 20 भारतीय सेना के जवानों की मौत के बाद पूरा देश गुस्से में है। देश में चीन विरोधी मुहिम शुरू हो चुका है। गोन्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ पंकज पचौरी ने इसका विश्लेषन किया है कि- ‘पीएम मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच करीबी दोस्ती’ के बावजूद चीन किस तरह भारत की सिर्फ ज़मीन पर ही नहीं बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी पैठ जमा ली है।

आंकड़े बताते हैं कि भारत-चीन के बीच व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। सन् 2000 से 2005 तक भारत, चीन को जितना निर्यात करता था उससे कम आयात करता था। लेकिन हालात बदलने के साथ ही आंकड़ों में भी बड़ी तब्दीली आई है। साल 2020 में भारत-चीन के बीच व्यापार घाटा बढ़कर 54.6 बिलियन डॉलर पर पहुंच गया है।

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यही नहीं भारतीय स्टार्टअप्स में चीनी कंपनियों का भारी निवेश है। चीनी कंपनियों का ज़्यादतर इंफ्रास्ट्रक्चर, कंज़्युमर गुड्स, ऑटोमोबाइल, एनर्जी और रियल एस्टेट में है। एक अनुमान के मुताबिक़ चीन की करीब 800 कंपनियां भारत में काम कर रही हैं। पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बाद से भारतीय कंपनियों में चीन का इन्वेस्टमेंट बढ़ा है। साल 2014 में चीन के राष्ट्रपति से पीएम मोदी के मुलाकात के बाद चीन की 250 से ज़्यादा कंपनियों ने भारत में इन्वेस्टमेंट किया। ये इन्वेस्टमेंट करीब 800 बिलियन डॉलर का था।

इसी का नतीजा है कि भारत की 75 फीसदी बिजली घरों में चीनी उपकरणों का इस्तेमाल हो रहा है। मोदी सरकार ने सौर उर्जा को बढ़ावा देने के लिए मिशन शुरू किया जिनमें 80 फीसदी से ज़्यादा चीनी कंपनियों का निवेश है।

बता दें कि भारत में टॉप पांच मोबाइल कंपनियों में चार चीन की है जिनमें करीब 7.2 बिलियन डॉलर का निवेश है। इनमें ओप्पो, वीवो, श्योमी और व्हावे शामिल है।

इसके अलावा भारत की टॉप 30 यूनिकॉर्न में 18 ऐसे हैं जिनमें चीनी कंपनियों का भारी निवेश है। इनमें ज़ोमेटो में 500 मिलियन डॉलर का निवेश चीनी कंपनी अलीबाबा का है। साथ ही फूड डिलिवरी ऐप स्विग्गी में 500 मिलियन डॉलर, ओला में 500 मिलियन डॉलर, पेटीएम और पेटीएम मॉल में 500 मिलियन डॉलर की मोटी रक़म चीन का लगा है।
ये ज़ाहिर तौर पर साफ है कि चीन का क़ब्ज़ा सिर्फ भारत की ज़मीनी स्तर पर ही नहीं बल्कि आर्थिक और मानसिक स्तर पर भी है। इससे बाहर निकलना भारत के लिए काफी चुनौतीपूर्ण और मुश्किल है।

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